रांची, झारखंड:
अनगड़ा थाना क्षेत्र की रैयती जमीन को लेकर वन विभाग एवं खरीदार व रैयती विक्रेतागण के बीच एक नया विवाद सामने आया है। वन विभाग का दावा है कि संबंधित भूमि वन क्षेत्र से जुड़ी है तथा विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर उस पर कार्रवाई की गई है। विभाग की ओर से दर्ज प्राथमिकी में जमीन से जुड़े कुछ लोगों पर अनियमितता और अवैध हस्तांतरण से संबंधित आरोप लगाए गए हैं।
वहीं दूसरी ओर खरीदार एवं रैयती पक्षकारों ने वन विभाग के दावे को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है। खरीदार इमरोज अंसारी एवं रैयती पक्षकारों ने आरोप लगाया है कि वन विभाग को गुमराह कर व्यक्तिगत दुश्मनी के तहत झूठी शिकायत कर प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। पक्षकारों का कहना है कि पूरे मामले में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया तथा वैध दस्तावेजों की अनदेखी की गई।
विवादित भूमि खाता संख्या 229, प्लॉट संख्या 72, रकबा लगभग 39 डिसमिल बताई जा रही है। रैयती पक्ष का दावा है कि भूमि वर्षों से निजी रैयती रिकॉर्ड में दर्ज है तथा उससे संबंधित खतियान, पंजीकृत दस्तावेज, सरकारी रसीद और पुराने न्यायिक अभिलेख उपलब्ध हैं।
मामले में यह भी कहा गया है कि कई न्यायालयों द्वारा हुकुमनामा एवं रैयती अधिकार को पूर्व में वैध माना जा चुका है। टाइटल सूट संख्या 250/2006 के निर्णय का हवाला देते हुए पक्षकारों ने कहा कि न्यायालय ने भूमि को रैयती श्रेणी की जमीन माना था।
रैयती पक्षकारों ने आरोप लगाया कि वन विभाग के पास भूमि अधिग्रहण, मुआवजा भुगतान अथवा स्वामित्व से संबंधित कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं है। आरटीआई आवेदन और लीगल नोटिस के माध्यम से जानकारी मांगे जाने के बावजूद विभाग की ओर से कोई ठोस जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया।
खरीदार पक्ष ने कहा कि केवल “बंडा पर्चा” के आधार पर किसी जमीन पर स्वामित्व स्थापित नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार बंडा पर्चा मात्र राजस्व रिकॉर्ड होता है, जबकि वास्तविक स्वामित्व का निर्धारण खतियान, पंजीकृत दस्तावेज और न्यायालय के आदेशों से होता है।
मामले में नोवा न्यूज़ नेटवर्क के निदेशक एकरामुल हक का नाम भी शामिल किए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई गई है। पक्षकारों का कहना है कि एकरामुल हक एक प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता एवं सम्मानित न्यूज़ नेटवर्क के निदेशक हैं, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत प्रतिशोध के तहत मामले में झूठा फंसाया गया है।
रैयती पक्ष ने आरोप लगाया कि सलीम अंसारी, जो अनगड़ा थाना कांड संख्या 35/2026 में रंगदारी और आपराधिक धमकी के आरोपों का अभियुक्त बताया जा रहा है, ने बदले की भावना से वन विभाग को गुमराह किया। आरोप है कि साजिश के तहत झूठी शिकायत देकर प्राथमिकी दर्ज कराई गई ताकि खरीदार और रैयती पक्षकारों को मानसिक एवं कानूनी रूप से प्रताड़ित किया जा सके।
स्थानीय लोगों के बीच यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। पक्षकारों ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा है कि पूरे प्रकरण की जांच वैध दस्तावेजों और न्यायालयीय रिकॉर्ड के आधार पर की जानी चाहिए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।